भगीरथ संकल्प
सूख चुकी थी पृथ्वी की देह,
नदियाँ बस नाम रह गई थीं,
बादल —
जैसे किसी निर्वासित गाथा के भटके हुए अक्षर।
धरती की छाती पर
दरारें थीं,
भूख के नक्शे थे,
प्यास की चीखें थीं।
तब...
एक अकेला उठा —
नंगे पाँव, धूप से झुलसा,
अग्निपथ रचता हुआ!
उसने समय के देवताओं को नहीं मनाया,
न द्रवित किया किसी युग के भाग्य को,
बस अपने कंधों पर उठा लिया
एक पूरे ब्रह्मांड का बोझ।
छेनी-हथौड़ी से नहीं,
अपने हठ से, अपने अश्रु से,
पर्वत की छाती को चीर डाला,
और धरती को दिया —
जल, जीवन, गति।
भगीरथ था वह —
न किसी मंदिर में पूजित,
न किसी कथा में अलंकृत,
बस मिट्टी से उठकर
मिट्टी के लिए जिया।
आज भी जब धरती रोती है,
आकाश थमता है,
तो एक भगीरथ
चुपचाप जन्म लेता है —
अपने भीतर
संपूर्ण सृष्टि को संचालित कर देने के संकल्प के साथ।
©®अमरेश सिंह भदौरिया
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