बरगद का पुरुषत्व
वो पीपल नहीं,
जो पूजा जाए,
ना नीम,
जिसकी कड़वाहट सब पहचानें—
वो बरगद है…
जिसकी जड़ें
धरती के भीतर भी फैली हैं,
और ऊपर भी
छाँव की एक मौन व्यवस्था बनाती हैं।
वो नमी नहीं माँगता,
ना तालियों की गूंज चाहता है—
बस खड़ा रहता है
हर मौसम, हर मिज़ाज में—
बिना हिले, बिना बोले।
बरगद—
हर गाँव का पुरखा,
हर आँगन की छाँव,
हर थके इंसान का टेक।
जैसे वो पुरुष,
जो कभी थकता नहीं,
कभी झुकता नहीं,
बस
कंधों पर छत,
और आँखों में
सबके लिए भरोसा रखता है।
उसे मालूम है,
हर शाख पर कोई ना कोई टिका है—
बेटा, पिता, भाई, या बूढ़ी माँ,
और उसकी छाया
कभी छुट्टी नहीं लेती।
वो चुप है,
पर मौन नहीं—
उसकी हर जड़
जैसे कहती है—
“अगर मैं हिला,
तो ये घर,
ये गाँव,
ये पूरा कुल-समाज
डगमगा जाएगा।”
बरगद कभी
“आई लव यू, डैड” नहीं सुनता,
ना उसे फूलों का दिन चाहिए—
पर फिर भी
हर बेटे की राह
उसी की छाँव में बनती है।
बरगद का पुरुषत्व
सिर्फ तन में नहीं,
धैर्य में है,
जो आँधी में भी
शांत खड़ा रहता है—
अपनों की ओर पीठ नहीं करता।
©®अमरेश सिंह भदौरिया
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