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अमलतास

 

अमलतास

चुपचाप झरता है अमलतास,
जैसे पीली चूड़ियाँ
गिर रही हों किसी दुल्हन की कलाई से।

गाँव की पगडंडी पर
जब धूप भी सो रही होती है,
तब वह
रंग भरता है उदासी में।

न फूलों का शोर,
न ख़ुशबू का घमंड—
बस पीली परतों में
एक ऋतु की मुस्कान ओढ़े
वह खड़ा रहता है।

लड़कियाँ उसके नीचे
खेल जाती हैं ब्याह-बनाव की कल्पनाएँ,
बुजुर्ग उसकी छाँव में
बीते दिनों की धूप सेंकते हैं।

अमलतास—
केवल फूल नहीं,
एक वक़्त का पुलिंदा है,
जिसमें यादें झरती हैं
धूप की तरह,
धीरे-धीरे,
मौसम के संग।

©®अमरेश सिंह भदौरिया

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