अग्नि परीक्षा
वो खड़ी थी,
हज़ारों आँखों के बीच
एक चुप्पी की चिता पर—
सिर ऊँचा, पाँव नंगे,
और रेखाएँ आग से लिपटी हुईं।
राम बोले थे—
"संदेह का कोई स्थान नहीं,
पर जनता का विश्वास ज़रूरी है।"
और सीता हँस दी थी—
वो हँसी नहीं थी,
वो एक चटकती हुई अस्मिता थी
जो अग्नि में क़दम रखने जा रही थी,
सिर्फ़ प्रेम नहीं— पृथ्वी की गवाही लेकर।
आग ने जलाया नहीं,
बस परखा—
और चुपचाप लौट आई
एक स्त्री की गरिमा में नहाई।
पर प्रश्न वही रहा—
सिद्ध क्यों करना पड़ा?
और किसके लिए?
युग बीत गए,
रामायणों के पन्ने पीले हो गए,
लेकिन सीता की अग्निपरीक्षा
आज भी जारी है—
जब कोई लड़की
रात को अकेली घर लौटती है,
या बिना सिंदूर के सिर ऊँचा करती है,
या मायके में मुस्कुरा देती है—
तब समाज पूछता है—
“क्यों? कैसे? किस अधिकार से?”
पर आज की सीता चुप नहीं रहती।
वो कहती है—
“मैं अब अग्नि में नहीं उतरूँगी—
अगर प्रेम पर संदेह है,
तो परीक्षा तुम्हारी होगी।”
अब अग्नि भी उसकी है,
ज्वाला भी, और उजास भी।
©®अमरेश सिंह भदौरिया
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