Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
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आँगन

 

आँगन

घर की छत से ज़्यादा
मुझे याद है वो आँगन,
जहाँ न दिन था, न रात,
बस जीवन था— खुला, बेलौस।

वहीं से शुरू होती थी
हर सुबह की पहली पुकार—
"जग जा बेटा, भोर हो गई!"
और वहीं बैठ कर
दादी सुनाती थीं
रूपकथाएँ और लोकगीत।

आँगन में तुलसी का चौरा था,
जो किसी मंदिर से कम नहीं।
और वो खटिया,
जिस पर बैठ
पिता रात के तारों से
सपनों की दिशा पूछते थे।

वहीं खेलते-झगड़ते
भाई-बहन बड़े हो गए,
और वहीँ
बरसों बाद
बिदाई में कोई आँचल भी भीग गया।

अब फ्लैट है,
बालकनी है,
पर आँगन नहीं है।

जहाँ मिट्टी थी,
वहाँ मार्बल है।
जहाँ रिश्ते थे,
अब बस नेटवर्क है।

आँगन वो जगह थी

जहाँ घर "घर" लगता था,
अब बस चारदीवारी है—
साफ़, सुंदर, लेकिन खाली।

आँगन मिट गया है,
पर मन अब भी
उसी कोने में बैठा है—
जहाँ कभी घर साँस लेता था।

©®अमरेश सिंह भदौरिया





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