स्वार्थ के बीमार अड़गड़े में कैद
एकलव्य बिरादरी की ये सन्तानें
दिन-प्रतिदिन बनती जा रहीं
समाज के ठेकेदारों द्वारा
उनके भरण-पोषण की स्थायी नुमाइशें
नौः छः के चाणक्य रहस्यों से महफूज
बिगड़े दिमाग की अल्पकालिक विकसित
दुनिया की मंडियों में आज
धड़ल्ले से जारी है इनकी खरीद-बिक्री
इनके शरीर के वजन से भी
कम गिनती के रुपयों में
एलोरा व अजंता की गुफाओं के
भित्ति चित्रों की आँखों से
दुनियाँ देखने को विवश
इन्हें खुद सुलझानी होगीं
अपनी विस्तृत समस्याओं की अनसुलझी गुत्थी
जब तक इनमें अपने जीने की
थोड़ी भी ललक ,आकांक्षा बची हो
अमरेन्द्र सुमन
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