ऐ दौर-ऐ- ज़िन्दगी तूने भी क्या क्या गुल खिलाये,
कभी खूंतर किया गमो ने तो कभी हम खुशियों से नहाये......
कभी तो हर कोई चला मेरे साथ,मुझे अपना समझ,
कभी तो दूर दूर तक दूर रहे मुझसे मेरे अपने ही साए...........
ऊँगली पकड़ी कभी जिंदगी ने मेरी मुझे बच्चा समझ,
कभी यूँ बेपरवाह हुई की ,जा भटकता है तो भटक जाये.......
कभी तो वो सब दिया ,जो मेरे खवाबों में भी न था,
और कभी ढेरों चाहतों पर सिर्फ खवाब ही दिखाए.......
आदर्श जिन्दगी जैसी भी दी खुद तूने मैं शुक्रगुज़ार हूँ,
इल्तिजा आखिरी यही,की कोई मेरे किये पर न ऊँगली उठाये.....
आदर्श
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