चमन हर सिम्त मुझको यहाँ बिखरा दिखायी दे,
जहाँ पर दश्त होते थे वहीँ सहरा दिखायी दे.......
आवाम-ऐ- शहर हरदम चीख कर देती दुहाई थी,
अमीर-ऐ- शहर मुझको तो वहाँ बहरा दिखायी दे.........
गुलों से दुश्मनी क्यूँ कर किसी से हो गयी यारों,
चमन में हर तरफ अब जो यहाँ पहरा दिखायी दे.......आदर्श बाराबंकवी
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