पुस्तक का नाम -- "शाम का तारा "
कवयित्री -- श्रीमती सुनीता सोलंकी ।
समीक्षक -- डॉ. राकेश कौशिक
मन को छू लेने वाली , मुहावरेदार शैली में आम आदमी की भावनाओं को सशक्त रूप से अभिव्यक्ति करने का नाम है -- "शाम का तारा" जो कवयित्री श्रीमती सुनीता सोलंकी जी की रचना धर्मिता का सशक्त दस्तावेज भी है । अपनी साफ सुथरी भाषा में समाज के विभिन्न पहलुओं का सूक्ष्म अवलोकन कर पाने में सिद्ध हस्त कवयित्री का प्रखर शब्द चित्रण है प्रस्तुत कविता संग्रह शाम का तारा जिसकी प्रत्येक कविता आपको चिंतन के उसी धरातल पर आने को विवश कर देती है जिस पर श्रीमती सुनीता आपको लाना चाहती है। महिला अधिकारों की प्रबल पक्षधर हैं । उनकी "स्त्री "नामक कविता में शक्ति स्वरूप मानते हुए वे कहती हैं :
"संकल्पित हो स्त्री यदि कर रही है कार्य ,उन्हें पूर्ण करने के लिए पूर्ण करने के लिए प्रकृति तत्पर, उद्धत ।किसी कार्य को करते हुए यदि स्त्री हुई कुंठित ,बेबस कायनात होकर कार्य करें सब खंडित ।" आधुनिकता के नाम पर आज जीवन में बढ़ती जटिलताएं ,व्याप्त होती विषमताएं जीवन के सहज व सरलपान को छिनती चली जा रही है सरलपान को चींटी चली जा रही हैं।मानव यंत्र सा बन कर बनकर ही रह गया है । सुनीता जी कहती हैं :
"विलुप्त होती हंसी भौंहे कसी कसी,पहले सी
खिलखिलाहट
चेहरे पर नहीं दिखी ,जीवन अंधेरी गुमनाम गुफा जिसमें ठहरा मनुष्य अपने दिमाग से बीमार सा।"मन की भावनाओं का तिरस्कार या फिर आत्म सम्मान को ठेस लगाने वाला माहौल कवयित्री को बिल्कुल भी पसंद नहीं है वह कहती है कि अपने अस्तित्व की रक्षा को स्वयं तैयार रहना चाहिए ।अपने अस्तित्व को पहचान दिलाने की कवायद की वे पैरवी करती हैं । नजरिया नामक कविता का एक उदाहरण देखिए : जब ज्ञात हुआ कि उनका नजरिया मेरे और मेरा अस्तित्व निर्धारण कैसे कर रहा है तो खुद को बचाने की ऊहापोह की कवायद शुरू करनी पडी ,हर हाल में खुद को पहचानने की कोशिश की।" व्याकुल मन की संवेदनशीलता का परिचय देते हुए कवियत्री के अशांत मन की व्यथा को इस प्रकार से सोलंकी जी कहती हैं-- रह रहकर यादों के कंकर न फेंकिए , मन का जलाशय निथारा है हमने का जलाशय निथारा है हमने गांधल न कीजिए ।"
कल्पना शील कविता का यह भी अंश बहुत प्रशंसनीय है: उत्थान की खोज में ,कभी आसमान के ख्याल ,कभी किसी पहाड़ की चोटी पर कल्पना उड़ान लेने लगती है और मैं ज्यों जीवंत होने उठती। "
दिन जादू भरा नामक कविता में कवयित्री निराशा में भी आशा अंधेरे में प्रकाश की किरण और ना उम्मीद में भी उम्मीद जगाती दिखती हैं - धुआं धुआं जिंदगी लगने लगे, तुम दीप खुशी के जला लेना । कैसी भी आंधियां चले आंचल की ओट से एक बुझता दीप बचा लेना ।"जीवन के व्यवहारिक पक्ष की
जटिलता से अनजान भोलेपन में सुनीता जी लिखती हैं -- कभी-कभी तो यूं हुआ, कई बरस बाद पता लगा ,अच्छा !जो बात मैंने हंसकर टाली थी, वह कमबख्त कटाक्ष था और इतनी बड़ी बात थी ।"
आधुनिकता के नाम पर जो भोंडापन, नंगापन आज के समाज में बुरी तरह से पसरता चला जा रहा है उससे कवयित्री का मन अत्यंत व्यथित है । फिर लिखती हैं -- नंगी हुई आज सभ्यता हम सब आदम आज भी उसी पाषाण युग में जी रहे हो जैसे ।"
सीधे सपाट लहज़े में अपनीबात कहने की पक्षधरसुनीता जी की स्पष्टवादिता की कविता एक बानगी देखिए - तो फिर लाग लपेट रिश्तों का कैसा ,सबका अपना अपना पैसा । स्त्री विमर्श और स्त्री की मनोभावनाओं को स्पष्ट रूप से समझाते हुए कहती हैं - स्त्री कभी बुद्ध बनने जैसी मूर्खता नहीं करेगी। " साजिशन फसावट में आ नहीं सकती ,इसे हर अच्छे बुरे का एहसास हो जाता है ना ,यह जहां फसती है अपनी इच्छा से ही फसती है ।"सुनीता जी की अधिकांश कविताएं स्त्री विमर्श को समेटे हुए हैं विभिन्न पक्षों पर गंभीर टिप्पणी करने से भी वह नहीं चूकती हैं।बल्कि पाठक की चेतना को झकझोर देने में वह पूरी तरह से समर्थ हैं । इस संग्रह की अनेक कविताएं पाठक के मन को उसे स्तर पर ले जाने में सफल है जहां कवयि त्री उनको ले जाना चाहती है । ऐसी ही कुछ कविताएं हैं -- डॉक्टर थी वो,कच्चा मन,चाय में घोल पी गई ,महात्मा, हस्तांतरण, बड़भागी नार , नजरिया ,लड़की का घर , व्यक्ति और वृक्ष,बुद्ध ,वर्तुलाकर संवेदनाएं , पीर ,बुद्ध से बुद्धिमान , मेहतरानी - जैसी अनेक कविताएं हैं । विश्वास है इस संग्रह के अधिकांश कविताएं पाठको द्वारा सराही जाएंगी।आशा है कविता की रचना धर्मिता यूं ही चलती रहेगी और वह अपने कल्पनाशीलता से समाज के सरोकारों को अपनी लेखनी द्वारा तीखे लेकिन सरल रूप में प्रस्तुत करती रहैंगी। उनके लेखन में नव आयाम, नवाचार प्रतिमान स्थापित करने की अमित संभावनाएं हैं आशा है कि यह संग्रह सुधी पाठकों की न केवल सराहना प्राप्त करेगा अपितु यह केउनके पुस्तकालय में शान भी बन सकेगा । शुभकामना।
डॉ राकेश कौशिक
मुजफ्फरनगर
कवयित्री -- श्रीमती सुनीता सोलंकी ।
समीक्षक -- डॉ. राकेश कौशिक
मन को छू लेने वाली , मुहावरेदार शैली में आम आदमी की भावनाओं को सशक्त रूप से अभिव्यक्ति करने का नाम है -- "शाम का तारा" जो कवयित्री श्रीमती सुनीता सोलंकी जी की रचना धर्मिता का सशक्त दस्तावेज भी है । अपनी साफ सुथरी भाषा में समाज के विभिन्न पहलुओं का सूक्ष्म अवलोकन कर पाने में सिद्ध हस्त कवयित्री का प्रखर शब्द चित्रण है प्रस्तुत कविता संग्रह शाम का तारा जिसकी प्रत्येक कविता आपको चिंतन के उसी धरातल पर आने को विवश कर देती है जिस पर श्रीमती सुनीता आपको लाना चाहती है। महिला अधिकारों की प्रबल पक्षधर हैं । उनकी "स्त्री "नामक कविता में शक्ति स्वरूप मानते हुए वे कहती हैं :
"संकल्पित हो स्त्री यदि कर रही है कार्य ,उन्हें पूर्ण करने के लिए पूर्ण करने के लिए प्रकृति तत्पर, उद्धत ।किसी कार्य को करते हुए यदि स्त्री हुई कुंठित ,बेबस कायनात होकर कार्य करें सब खंडित ।" आधुनिकता के नाम पर आज जीवन में बढ़ती जटिलताएं ,व्याप्त होती विषमताएं जीवन के सहज व सरलपान को छिनती चली जा रही है सरलपान को चींटी चली जा रही हैं।मानव यंत्र सा बन कर बनकर ही रह गया है । सुनीता जी कहती हैं :
"विलुप्त होती हंसी भौंहे कसी कसी,पहले सी
खिलखिलाहट
चेहरे पर नहीं दिखी ,जीवन अंधेरी गुमनाम गुफा जिसमें ठहरा मनुष्य अपने दिमाग से बीमार सा।"मन की भावनाओं का तिरस्कार या फिर आत्म सम्मान को ठेस लगाने वाला माहौल कवयित्री को बिल्कुल भी पसंद नहीं है वह कहती है कि अपने अस्तित्व की रक्षा को स्वयं तैयार रहना चाहिए ।अपने अस्तित्व को पहचान दिलाने की कवायद की वे पैरवी करती हैं । नजरिया नामक कविता का एक उदाहरण देखिए : जब ज्ञात हुआ कि उनका नजरिया मेरे और मेरा अस्तित्व निर्धारण कैसे कर रहा है तो खुद को बचाने की ऊहापोह की कवायद शुरू करनी पडी ,हर हाल में खुद को पहचानने की कोशिश की।" व्याकुल मन की संवेदनशीलता का परिचय देते हुए कवियत्री के अशांत मन की व्यथा को इस प्रकार से सोलंकी जी कहती हैं-- रह रहकर यादों के कंकर न फेंकिए , मन का जलाशय निथारा है हमने का जलाशय निथारा है हमने गांधल न कीजिए ।"
कल्पना शील कविता का यह भी अंश बहुत प्रशंसनीय है: उत्थान की खोज में ,कभी आसमान के ख्याल ,कभी किसी पहाड़ की चोटी पर कल्पना उड़ान लेने लगती है और मैं ज्यों जीवंत होने उठती। "
दिन जादू भरा नामक कविता में कवयित्री निराशा में भी आशा अंधेरे में प्रकाश की किरण और ना उम्मीद में भी उम्मीद जगाती दिखती हैं - धुआं धुआं जिंदगी लगने लगे, तुम दीप खुशी के जला लेना । कैसी भी आंधियां चले आंचल की ओट से एक बुझता दीप बचा लेना ।"जीवन के व्यवहारिक पक्ष की
जटिलता से अनजान भोलेपन में सुनीता जी लिखती हैं -- कभी-कभी तो यूं हुआ, कई बरस बाद पता लगा ,अच्छा !जो बात मैंने हंसकर टाली थी, वह कमबख्त कटाक्ष था और इतनी बड़ी बात थी ।"
आधुनिकता के नाम पर जो भोंडापन, नंगापन आज के समाज में बुरी तरह से पसरता चला जा रहा है उससे कवयित्री का मन अत्यंत व्यथित है । फिर लिखती हैं -- नंगी हुई आज सभ्यता हम सब आदम आज भी उसी पाषाण युग में जी रहे हो जैसे ।"
सीधे सपाट लहज़े में अपनीबात कहने की पक्षधरसुनीता जी की स्पष्टवादिता की कविता एक बानगी देखिए - तो फिर लाग लपेट रिश्तों का कैसा ,सबका अपना अपना पैसा । स्त्री विमर्श और स्त्री की मनोभावनाओं को स्पष्ट रूप से समझाते हुए कहती हैं - स्त्री कभी बुद्ध बनने जैसी मूर्खता नहीं करेगी। " साजिशन फसावट में आ नहीं सकती ,इसे हर अच्छे बुरे का एहसास हो जाता है ना ,यह जहां फसती है अपनी इच्छा से ही फसती है ।"सुनीता जी की अधिकांश कविताएं स्त्री विमर्श को समेटे हुए हैं विभिन्न पक्षों पर गंभीर टिप्पणी करने से भी वह नहीं चूकती हैं।बल्कि पाठक की चेतना को झकझोर देने में वह पूरी तरह से समर्थ हैं । इस संग्रह की अनेक कविताएं पाठक के मन को उसे स्तर पर ले जाने में सफल है जहां कवयि त्री उनको ले जाना चाहती है । ऐसी ही कुछ कविताएं हैं -- डॉक्टर थी वो,कच्चा मन,चाय में घोल पी गई ,महात्मा, हस्तांतरण, बड़भागी नार , नजरिया ,लड़की का घर , व्यक्ति और वृक्ष,बुद्ध ,वर्तुलाकर संवेदनाएं , पीर ,बुद्ध से बुद्धिमान , मेहतरानी - जैसी अनेक कविताएं हैं । विश्वास है इस संग्रह के अधिकांश कविताएं पाठको द्वारा सराही जाएंगी।आशा है कविता की रचना धर्मिता यूं ही चलती रहेगी और वह अपने कल्पनाशीलता से समाज के सरोकारों को अपनी लेखनी द्वारा तीखे लेकिन सरल रूप में प्रस्तुत करती रहैंगी। उनके लेखन में नव आयाम, नवाचार प्रतिमान स्थापित करने की अमित संभावनाएं हैं आशा है कि यह संग्रह सुधी पाठकों की न केवल सराहना प्राप्त करेगा अपितु यह केउनके पुस्तकालय में शान भी बन सकेगा । शुभकामना।
डॉ राकेश कौशिक
मुजफ्फरनगर
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