Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
Administrator

राम की अन्तर्द्वन्द्व समीक्षा ​

 

राम की अन्तर्द्वन्द्व समीक्षा


सब कहते हैं कथा राम की 
नहीं समझते व्यथा राम की। 
मन में क्या क्या द्वंद्व मचा है 
आदर्श पालन जथा राम की। 

अ कीर्ति वर्द्धन

द्वंद्व का घन कभी न छाता——- 

 संस्कृत साहित्य में पंडित विश्वनाथ जी ने साहित्य दर्पण में खण्ड काव्य की निम्न परिभाषा दी है 
भाषा विभाषा नियमात् काव्यं सर्गसमुत्थितम्। 
एकार्थप्रवणै: पद्यै: संधि-साग्रयवर्जितम्। 
खंड काव्यं भवेत् काव्यस्यैक देशानुसारि च। 

विद्वानों के अनुसार खंड काव्य में जीवन के किसी खंड का वर्णन किया जाता है। डॉ वीणा शंकर शर्मा चित्रलेखा जी ने राम का अन्तर्द्वन्द्व पर अपनी भूमिका लिखते हुये प्रस्तुत पुस्तक को शैली की दृष्टि से खंड काव्य रूप में ही रेखांकित किया है। 
 प्रस्तुत खंड काव्य में वनवास के दौरान एकांत पलों में आत्मचिंतन मंथन करते हुये राम के मन के उमड़ते घुमड़ते प्रश्न कारण, उनके कारण अन्तर्मन में उपजी व्यथा या अंतर्द्वंद्व पर विद्वान कवि डॉ विनय कुमार सिंघल ‘निश्छल’ द्वारा किया गया यह कार्य सर्वथा अनूठा है। यह सत्य है कि कोई भी मनुष्य चाहे वह कितना भी श्रेष्ठ हो, देवतुल्य हो यदि उसके साथ जाने अनजाने छल से अथवा बल से कोई अन्याय किया जाता है अथवा उसके अधिकारों का हनन किया जाता है तो उसके मन में पीड़ा टीस दर्द व्यथा, आप कुछ भी कहें होना स्वाभाविक है। यह अलग बात है कि बड़ों के प्रति मर्यादा सम्मान का भाव, दायित्व बोध मन में रखते हुए वह मौन रहकर उस अन्याय को सहन कर लेता है। परन्तु मन की अतल गहराइयों में वह अन्याय शूल की तरह वक्त बे वक्त जख्मों को कुरेदता अवश्य है। उसी अनकहे दर्द को डॉ विनय जी ने शब्दों में पिरोने का प्रयास किया है। 
राम व रामायण के पात्रों पर विभिन्न विद्वानों द्वारा सदैव से बहुत कुछ लिखा रचा जाता रहा है। परन्तु राम के मानसिक द्वन्द्व पर किसी का ध्यान न जा सका। हमें भी यही लगता है कि राम की मानसिक वेदना को चित्रित करता यह प्रथम ग्रंथ है जिसके लिये डॉ विनय सिंघल जी साधुवाद के पात्र हैं। शायद डॉ विनय जी जैसे अलग चिंतन वाले व्यक्तियों के लिये ही कहा जाता है कि जहाँ न पहुँचे रवि वहाँ पहुँचे कवि। 

 द्वंद्व का घन कभी न छाता, 
यदि मैं यूँ वनवास न पाता। 

 बस सारा सार इन दो पंक्तियों में ही समाहित है। जिसमें राम की मनोदशा व्यथित मन की पीड़ा दर्द बेबसी झलकती है। शायद यह केवल राम की ही पीड़ा नहीं अपितु उस प्रत्येक व्यक्ति की पीड़ा है जो बड़ों के मान सम्मान मर्यादा पालन तथा कर्तव्य निर्वहन को प्रथम रखता है। 

जब अभिषेक रोक कर मेरा 
पिताश्री चुप बैठे होंगे 
उनके भीतर के कोलाहल 
अतल घटो में पैठे होंगे। 

 यह पीड़ा केवल राम के मन की नहीं अपितु दशरथ के मन की पीड़ा जो राम महसूस कर रहे हैं उसका भी निरूपण चित्रित किया गया है। यह कवि के चिंतन की गहराई है जो पाताल से भी विचारों का विलोपन करती है। 
वन में सीताहरण के पश्चात सीता की तलाश में भटकते राम की मनोदशा का चित्रण/ अंतर्द्वंद्व —

मैं लौटूँगा अब किस मुँह से 
माँ पूछेगी सिया कहाँ है 
नहीं नहीं मैं क्यों लौटूँगा 
जाना मुझको सिया जहाँ है। 

 सभी राम कथाओं में सीता हरण के पश्चात राम की मानसिक दशा तथा लक्ष्मण मूर्छा के बाद राम की पीड़ा पर बहुत कुछ लिखा गया है। परन्तु कहीं भी राज्य की लालसा अथवा वन में होने वाले कष्टों के कारण राम के मन में उपजे अनकहे द्वंद्व पर कुछ नहीं लिखा गया है। डॉ सिंघल ने श्रीराम के मन में सुप्त विचारों को राम को प्राणी मात्र मानते हुए उकेरने का सफल प्रयास किया है। 
प्रारंभ के कुछ पृष्ठों में राम के अंतर्द्वंद्व को स्वयं समझते हुये एक प्रकार से राम के मौन को मुखर करने का प्रयास किया है। यह भी अनूठा प्रयोग है जो सम्भवतः भूमिका की तरह परिलक्षित होता है। 

तुम परिपक्व आयु में वन को 
चले गये सब छोड़ झरोखे 
तुमने स्वप्न बुने तो होंगे 
किस विध सत्ता भोग करोगे? 

 और 
 अनुज लखन का करवट लेना 
तुम रागी कब सहते होंगे 
लक्ष्मण का पाप ही क्या था 
प्रस्तर पर वह रहते होंगे। 

 द्वंद्व का घन कभी न छाता 
 यदि मैं यूँ वनवास न पाता।

 पाठकीय दृष्टिकोण से हमारे विचार में यह अद्भुत ग्रंथ है। जिसमें सहज सरल भाषा में मन में उठते ज्वार भाटा का शब्दों में चित्रांकन किया गया है। पाठक पढ़ते हुए उसी काल में स्वयं को खड़ा महसूस करता है। श्रेष्ठ सृजन के लिये डॉ विनय कुमार सिंघल को बहुत-बहुत बधाई एवं साधुवाद। माँ शारदे की कृपा सदैव बनी रहे। 

 डॉ अ कीर्ति वर्द्धन 
 ५३ महालक्ष्मी एनक्लेव 
 मुज़फ़्फ़रनगर २५१००१ 
मोबाइल ८२६५८२१८००




 2 Attachments  •  Scanned by Gmail





Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY
हर उत्सव के अवसर पर उपयुक्त रचनाएँ