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है नहीं औक़ात किसी की, जो प्रतिभाओं को रोक सके,
सूरज की किरणों को धरा पर, सुबह सवेरे रोक सके।
उपवन पर अंकुश लग सकता, फूल न खिलने पायें,
नहीं लगा पवन पर अंकुश, खुश्बू फैलाने से रोक सके।
नदियाँ बहती परोपकार हित, बाँध बनाकर रोक रहे,
नहीं किसी में हिम्मत, जो पानी को बहने से रोक सके।
जितने ऊँचे बाँध बनेंगे, वह उतना ऊपर चढ़ जायेगा,
पानी की प्रवृत्ति तो बढ़ना, बाँध न उसके रोक सके।
कब अंकुश लगा विचारों पर, या कल्पना पर रोक लगी,
नहीं कोई विज्ञान बना जो, मन की गति को रोक सके।
माना तुमने वृक्ष काट कर, बंजर धरा बना डाली,
बंजर में भी उपवन उगता, कौन है जो प्रकृति को रोक सके।
अ कीर्ति वर्द्धन
53 महालक्ष्मी एनक्लेव
मुज़फ़्फ़रनगर 251001
8265821800
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