जब कभी थे काम के, कद्र अपनी थी बहुत,गर्दिशों का दौर आया, हासिये पर हैं बहुत।
सीखना सिलाई कढ़ाई, बेटियों की शान थी,
जंग लगा बेबस हुये, ठुकराये गये हम बहुत।
अ कीर्ति वर्द्धन
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