अपने जब बेगाने बनें, छोड़ दो,
बाढ़ आने का डर, धारा मोड़ दो।
संबंध निभाने की चाह, उम्र भर,
रिश्ता बोझ लगने लगे, तोड़ दो।
कौन क्या कहेगा, मत सोचिए,
राह में काँटे अगर, राह छोड़ दो।
हौसला मुश्किलों से लड़ने का हो,
राह के पत्थरों का, रुख़ मोड़ दो।
दिवार आँगन में खड़ी, सदा होती रही,
नफ़रतें पनपने से पहले, प्यार रोप दो।
कौन जाने कब यहाँ, ग़ैर ही अपना बनें,
अपनों के दरमियान, अपनापन जोड़ दो।
Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY