प्रभु! मन में आन क्यों भरा: ' मानवीय नियति का महाख्यान कवि: डॉ. तारा सिंह
डॉ. दिव्या स्मृति
साहित्य जब केवल मनोरंजन या सतही भावनाओं से ऊपर उठकर आत्मा के गहनतम कोनों को झकझोरने लगता है, तब वह कालजयी बन जाता है। डॉ. तारा सिंह जी की विचारोत्तेजक रचना "प्रभु! मन में आन क्यों भरा" एक ऐसी ही विरल कृति है, जिसे पढ़कर अंतरात्मा तक काँप जाती है। इस कविता का शीर्षक ही अपने आप में एक संपूर्ण और अकाट्य मानव-दर्शन है। मात्र एक पंक्ति के इस प्रश्न में कवयित्री ने आदि-अनादि काल से चले आ रहे मानवीय संकट, उसके अस्तित्व के अंतर्विरोध और पतन की क्रोनोलॉजी को समेट दिया है। डॉ. दिव्या स्मृति की यह समीक्षा इस कविता के सूक्ष्म रेशों को उधेड़कर उसके भीतर छिपे शाश्वत सत्यों को हमारे सामने लाती है।
भाव-पक्ष: ईश्वर से शलाघा या आत्म-निरीक्षण का आमंत्रण - यह कविता प्रथमतया देखने में सृष्टिकर्ता यानी प्रभु को संबोधित एक शिकायत या जिज्ञासा प्रतीत होती है, किंतु इसका वास्तविक प्रहार और इसकी धार मनुष्य की चेतना की ओर मुड़ी हुई है। कवयित्री प्रभु के बहाने मनुष्य से ही उसकी नियति और उसके भटकाव पर कड़े सवाल पूछ रही हैं। संपूर्ण भाव-पक्ष को तीन वैचारिक सोपानों (बंदों) में समझा जा सकता है:
सृष्टि-संरचना और 'आन' का रहस्य (प्रथम बंद) कवयित्री कविता के प्रारंभ में उस आदि-क्षण की कल्पना करती हैं जब इस ब्रह्मांड की रचना हुई होगी। प्रभु ने जब इस संसार के कण-कण के परिहास और विद्रूपताओं के बीच मनुष्य को गढ़ा, तो परिस्थितियाँ पूरी तरह अनुकूल नहीं थीं। वहाँ पहले से ही 'दशमुख तम' यानी रावण रूपी दस मुखों वाला भयावह अंधकार, दंभ और बुराइयाँ मौजूद थीं। ऐसे तिमिर के बीच प्रभु ने मनुष्य को केवल हाड़-मांस का पुतला नहीं बनाया; उन्होंने उसके भीतर 'हृदय' रखा, हृदय में 'प्राण' फूँके, प्राणों को 'मन' की गति दी और अंततः उस मन में 'आन' भर दिया। यहाँ 'आन' शब्द इस पूरी कविता का केंद्र-बिंदु (Epcenter) है। यह 'आन' एक तरफ जहाँ मनुष्य का पवित्र स्वाभिमान, उसकी गरिमा और उसकी दिव्यता है, वहीं दूसरी तरफ यही 'आन' अहंकार के बीजारोपण की भूमि भी है। ईश्वर ने तो वरदान स्वरूप स्वाभिमान दिया था, पर मनुष्य ने उसे क्या बना दिया, यही कविता का मूल विषय है।
मनुष्य के विकास और उसके बाद शुरू हुए पतन की कहानी कहता है। ईश्वर से मिली उसी 'आन' या गरिमा की रक्षा के भ्रम में मनुष्य ने अपनी यात्रा शुरू की थी। उसका लक्ष्य इस सुंदर धरा को अपनी साधना से 'स्वर्ग' बनाना था। परंतु, रास्ते में वह अपनी ही पहचान खो बैठा। मनुष्य की त्रासदी यह हुई कि उसने जीवन को सींचने वाली 'प्रीति सुधा' (प्रेम रूपी अमृत) को त्याग दिया और उसकी जगह 'तृष्णा का गरल' (अंतहीन इच्छाओं और लोभ का विष) पीना शुरू कर दिया। आज के आधुनिक मनुष्य की स्थिति इसी विरोधाभास में कैद है—उसके अधरों पर फूलों सी कृत्रिम 'स्मिति' (मुस्कान) तो है, लेकिन वह भीतर ही भीतर ईर्ष्या, दंभ और असुरक्षा की आग में जल रहा है। वह बाहर से जितना भव्य दिखने का प्रयास करता है, भीतर से उतना ही खोखला और दग्ध है।
अहंकार का तोप-नाद और अंतिम चेतावनी (अंतिम बंद)
कविता के अंतिम हिस्से में कवयित्री इस संकट का समाधान और उत्तर पुनः प्रभु से ही माँगती दिखाई देती हैं। वे मनुष्य के इस बदले हुए रूप को 'आत्म-प्रतारक' (स्वयं को धोखा देने वाला) कहती हैं। जब मनुष्य की 'आन' विकृत होकर 'अहं' बन जाती है, तो वह शांत नहीं बैठती; वह 'तोप-सा नाद' करती है, विनाश का गर्जन करती है।
कवयित्री यहाँ एक अत्यंत गंभीर और अंतिम चेतावनी देती हैं। यदि मनुष्य ने समय रहते अपनी सीमाओं का अतिक्रमण नहीं रोका, यदि उसने प्रकृति, समाज और अपनी मर्यादा की रेखाओं को लाँघना बंद नहीं किया, तो उसका हश्र बुरा होगा। वह 'मनुज-पद्म' (मनुष्य रूपी पवित्र कमल), जिसे ईश्वर ने इतनी अनमोल चेतना के साथ खिलाया था, वह एक दिन इसी दंभ की धूल में 'भू-लुंठित' (मिट्टी में मिलकर) होकर हमेशा के लिए मुरझा जाएगा। यह मानव सभ्यता के समूल नाश की ।
डॉ. तारा सिंह जी की यह रचना जितनी वैचारिक रूप से समृद्ध है, शिल्प और कला-पक्ष की दृष्टि से भी उतनी ही सुगठित और शास्त्र-सम्मत है। तत्समनिष्ठ और संस्कृतनिष्ठ शब्दावली: कविता की भाषा में हिंदी साहित्य के 'छायावाद' युग की स्पष्ट और गौरवमयी छाप दिखाई देती है। इसमें 'मृणमय अधर', 'निभृत घाटियाँ', 'उच्छ्वासित प्राण' और 'दंभशिला' जैसे ऊँचे दर्जे के तत्सम शब्दों का प्रयोग किया गया है। यह शब्दावली कविता को एक तरह की शास्त्रीय गंभीरता और गरिमा प्रदान करती है, जिससे पाठक के मन में विस्मय और श्रद्धा का भाव जागता है।
कविता में प्रयुक्त हर एक प्रतीक अपने अर्थ को पूरी तरह संप्रेषित करने में सक्षम है। मनुष्य के अस्तित्व को 'पद्म' (कमल) कहना उसकी मूल कोमलता और पवित्रता को दर्शाता है, तो वहीं उसके अहंकार की तुलना 'तोप' से करना उसके विनाशकारी और हिंसक स्वभाव को उजागर करता है। इसी तरह 'तृष्णा का गरल' और 'प्रीति की सुधा' जैसे रूपक सीधे हृदय पर चोट करते हैं। तकनीकी रूप से यह रचना 'मुक्त छंद' के दायरे में आती है, लेकिन इसमें छंदहीनता का बिखराव नहीं है। कवयित्री ने 'भर/रहा/देगा/बाँधेगा' जैसे शब्दों के माध्यम से जो अंत्यानुप्रास (Rhyme) बुना है, वह कविता को एक आंतरिक गति और गेयता प्रदान करता है। यदि इस कविता का सस्वर पाठ किया जाए, तो पृष्ठभूमि में एक गहरा, गंभीर और करुण राग स्वतः गूँजने लगता है।
इस रचना की सबसे बड़ी विशेषता और इसकी वैचारिक 'ताकत' यह है कि डॉ. तारा सिंह यहाँ एक पारंपरिक, याचक भक्त की तरह ईश्वर के सामने घुटने नहीं टेकतीं। उनका तेवर 'अंधभक्ति' का नहीं, बल्कि 'तार्किक जिज्ञासा' और 'दार्शनिक संवाद' का है। वे सीधे सृष्टिकर्ता की न्यायप्रणाली और उसकी योजना पर प्रश्नचिह्न लगाती हैं—वे पूछती हैं कि हे प्रभु! मूल भूल किसकी है? आपकी, जो आपने मनुष्य के कोमल मन में 'आन' का यह विस्फोटक तत्व भरा; या हमारी, कि हम उस दिव्य वरदान को संभाल नहीं पाए और उसे विनाशकारी 'अहंकार' में बदल बैठे? यह सवाल आधुनिक युग का सबसे बड़ा यक्ष-प्रश्न है, जो हमें श्रीमद्भगवद्गीता के निष्काम कर्म और आत्म-संयम के संदेश की याद दिलाता है।
हृदय को चीर देने वाली केंद्रीय पंक्ति:
"मन का अहं मनुज का पथ-कंटक है, कौन बतायेगा"
यह एक पंक्ति आज के इस 'आभासी' और 'इंस्टाग्राम' युग का सबसे बड़ा सच है। आज का मनुष्य अपनी रील्स, लाइक्स, व्यूज और बाहरी प्रदर्शन के चक्कर में तीव्र आत्म-मुग्धता (Narcissism) का शिकार हो चुका है। हर व्यक्ति अपने ही बनाए 'अहं' के जाल में फँसकर अपने जीवन-पथ पर खुद ही काँटे बो रहा है। समीक्षक का यह सोचना बिल्कुल शत-प्रतिशत सही है कि इस पंक्ति को आज के दौर में स्कूली और कॉलेज के पाठ्यक्रमों का हिस्सा होना चाहिए ताकि युवा पीढ़ी आत्म-प्रतारणा से बच सके।
डॉ. तारा सिंह जी के बहुचर्चित बाल साहित्य (जैसे 'चिरकी-चुन्नू मुन्नू') से यदि इस गंभीर कविता की तुलना की जाए, तो कवयित्री के चिंतन का एक खूबसूरत सिरा हाथ लगता है। 'चिरकी-चुन्नू मुन्नू' में वे बच्चों को बेहद सरल शब्दों में सीख देती हैं—"मारो मत, जोड़ो"। वहाँ एक नन्हीं चिड़िया तिनका-तिनका जोड़कर सृजन का, प्रेम का और सह-अस्तित्व का सहज पाठ पढ़ाती है। आश्चर्यजनक रूप से, वही 'जोड़ने और सृजन करने' का मूल भाव इस प्रौढ़ कविता में एक विराट दार्शनिक और आध्यात्मिक गहराई के साथ प्रकट हुआ है। अंतर बस इतना है कि वहाँ चिड़िया समझा रही है, और यहाँ स्वयं कवयित्री अपनी गहरी चिंता के साथ ईश्वर के सामने खड़ी होकर मनुष्य को उसकी 'सीमा' और मर्यादा याद दिलाने की गुहार लगा रही हैं।
ऐसी कालजयी और वैचारिक विमर्श पैदा करने वाली रचना तथा उसकी इस उत्कृष्ट समीक्षा को केवल डायरियों या सीमित गोष्ठियों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। इसके प्रसार के लिए निम्नलिखित तीन माध्यम सर्वोत्तम हो सकते हैं:।
विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय सेमिनारों में, जहाँ विमर्श का विषय "छायावादोत्तर हिंदी कविता में ईश्वर का स्वरूप और चित्रण" या "आधुनिक कविता में मानवीय संकट" हो, वहाँ इस कविता को एक प्रामाणिक संदर्भ (Reference Code) के रूप में चुना जाना चाहिए और इस पर शोध- है । आज का युग दृश्य और श्रव्य (Audio-Visual) माध्यमों का है। यदि कुकु एफएम (Kuku FM) या पॉडकास्ट जैसे डिजिटल मंचों पर स्वयं डॉ. तारा सिंह जी की गंभीर, सधी और भारी आवाज़ में इस कविता का ऑडियो रूप रिकॉर्ड किया जाए, तो इसकी पंक्तियों का प्रभाव कई गुना बढ़ जाएगा। जब वे अपनी आवाज़ में कहेंगी कि अहं "तोप-सा नाद करता है", तो उस शब्द का वजन और उसकी गूँज श्रोता के भीतर सीधे उतर जाएगी। कहें तो, डॉ. तारा सिंह की कविता "प्रभु! मन में आन क्यों भरा" और डॉ. दिव्या स्मृति द्वारा की गई उसकी यह समीक्षा, दोनों मिलकर साहित्य का एक अत्यंत दुर्लभ और जरूरी दस्तावेज तैयार करते हैं। यह समीक्षा केवल कविता के गुण-दोष नहीं बताती, बल्कि भटके हुए आधुनिक समाज को आत्मनिरीक्षण का एक साफ़ दर्पण दिखाती है। यह हमें याद दिलाती है कि यदि मनुष्य को इस धरती पर बचे रहना है, तो उसे 'तोप' जैसे विनाशकारी अहं को छोड़कर 'मनुज-पद्म' जैसी कोमलता, मर्यादा और प्रेम की ओर वापस लौटना ही होगा। यह समीक्षा हिंदी आलोचना जगत् की एक मूल्यवान उपलब्धि है।
अनुराग सिन्हा
लक्ष्मी नारायण रोड़
छोटी सरैयागंज
मुजफ्फरपुर -842001
7903933150
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