गरीबी ~Satyendra Kumar Mishra
---'------'
घर में न आँटा है
चाँटा ही चाँटा है
पैसा भी पास नहीँ
मिलने की आस नहीँ
कोयला न चूल्हे में
गोईठा भी एक नहीं
तेल किरासन का
माचिस के साथ नहीं
सब्जी है कच्ची ही
रखी हुई टोकरी में
चावल है थोड़ा सा
बर्तन के पेंदी में
सामने ही दीख रहा
पक पाये कैसे ही
विकट समस्या है
बोलूँ क्या ईंधन की
कइयों से ले ली
उधारी न सम्भव है
खोलने से खुलता न
मुख भी तो बाहर में
एक कदम बाहर तो
एक कदम अंदर है
मिलती पगार नहीं
कोई उधार नहीं
शून्य सा ये जीवन है
क्रंदन ही क्रंदन है
Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY