भूख ~Satyendra Kumar Mishra
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तीन दिन से भूख से वह था प़डा
अन्न का दाना न कोई पर अड़ा
भीख मांगा है न अबतक वह कभी
हाथ फैलाया न कब भी वह अभी
जल ग्रहण कर वह उदर भरता रहा
निज व्यथा को ना किसी से कह सका
पर न शक्ति अब बची है पास में
चल प़डा भोजन की है वह आस में
लड़खड़ाते है कदम बढ़ते गये
है ठिठकता रोकता पर ना रुके
सेठ बैठे एक हैँ दूकान पर
गुड़ की बिक्री कर रहे वे थोक के
बोलता हे सेठ जी क्या भाव है ?
है सुगंधित आपके जो पास है
कितनी तुम्हें लेनी है बाबू बोल तो
मेरा गुड़ सबसे है उतम जान लो
कह रहा दस मन मुझे लेना भले
दाम बोलें सेठ जी ना तो चलें
सेठ की बांछें खिली वह बोलते
खा के देखें कह ही गुड़ वे तोड़ते
गुड़ मिले को डाल मुख मे वह दिया
स्वाद अच्छा है न; कह कर चल दिया
सेठ पीछे प़ड रहे पर कह रहा
दूसरे दूकान से अच्छा मिले ;जा देखता
लाचारी में भूख से थोडी शान्ति मिली है
पानी पी फिर श्रम के कोई कार्य ढूँढता
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