सामाजिक न्याय और समानता
सामाजिक न्याय एक ऐसा समाज बनाने पर जोर देता है जो न्याय संगत और समतामूलक हो । जहां देश के हर व्यक्ति को लिंग , जाति , धर्म का भेद-भाव किए बिना समान अधिकार और अवसर मिलें । सामाजिक न्याय की चर्चा हमारे संविधान की प्रस्तावना , मूल अधिकार और राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों में की गई है । इसमें सामाजिक , आर्थिक और राजनीतिक न्याय के सिद्धांतों को स्थापित किया गया है । सामाजिक न्याय सामाजिक संरचनाओं में समानता सुनिश्चित करता है । इसका उद्देश्य सामाजिक असमानता को दूर करना और अधिकारों से वंचित वर्गों का सशक्तिकरण करना और संसाधनों का उचित वितरण सुनिश्चित करना है ।
संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर सामाजिक न्याय के जनक माने जाते हैं । सामाजिक न्याय का उद्देश्य समाज में निष्पक्षता , समानता और संसाधन उपलब्ध करवाना है और ऐसे समाज का निर्माण करना है जिसमें सभी लोगों को सामान आर्थिक , राजनीतिक और सामाजिक अधिकार और अवसर मिलें तथा समावेशी समाज को बढ़ावा देना है ।
यह सभी व्यक्तियों को अपनी क्षमता का पूरा उपयोग करने का अवसर देता है । संसाधनों से वंचित व्यक्तियों को मुख्य धारा में जोड़ने का एक प्रयास है । समाज के वंचित लोगों को संसाधनों का उचित आवंटन करना है ताकि वे अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा कर सकें । कमजोर वर्गों की पहचान करना , महिलाओं , बच्चों , दिव्यांगों या इस परिधि में आने वाले सभी नागरिकों को सशक्त बनाना तथा उनके लिए विशेष नीतियों का क्रियान्वयन करना है । मानव अधिकारों के सम्मान , संरक्षण और संवर्धन पर जोर देना भी सामाजिक न्याय के अंतर्गत आता है ।
देश की आजादी के बाद संविधान निर्माताओं ने समाज के पिछड़े , दलित, अल्पसंख्यक , दिव्यांग जनों के लिए नियम , कानूनी अधिकार और अवसर प्रदान करने के सतत प्रयास किए हैं । लेकिन आज तक सामाजिक न्याय की प्रक्रिया पूर्णतया साकार रूप नहीं ले सकी है । कुछ अवसरवादी लोग तो संवैधानिक अधिकारों , सुविधाओं और अवसरों का लाभ उठाते हैं परन्तु जो वास्तव में वंचित हैं उन तक वे जानकारियां , सूचनाएं , सुविधाएं एवं संसाधन पहुंच ही नहीं पाते ।सामाजिक न्याय की बात अक्सर दृढ़ता से की जाती है लेकिन फिर भी समाज में शोषित , पीड़ित , वंचित लोगों की संख्या दिन-प्रतिदिन विकराल रूप धारण करती जा रही है । जिन लोगों को संसाधनों के समान आवंटन की जरूरत है वे ही संसाधनों के लाभ से वंचित रह जाते हैं । कुछ भ्रष्टाचारी लोग या सत्ता के चाटुकार ही सरकारी सुविधाओं का लाभ उठाते रहते हैं ।
इसीलिए समाज में सामाजिक न्याय से वंचित लोगों की संख्या जिनमें किसान , मजदूर , गरीब , दिव्यांग , तंगहाल महिलाएं , अनाथ बच्चे आदि जो समान अवसर की प्रतीक्षा में आस लगाए बैठे रहते हैं या अपने आकाओं की ओर ताकते हैं लेकिन फिर भी उनको समय पर सहायता नहीं मिल पाती ।वे आज भी लाचार , असहाय नजर आते हैं ।
इसलिए शिक्षाशास्त्रियों , बुद्धिजीवियों , न्यायविदों , नेताओं , समाज सेवकों सहित सामाजिक न्याय मंत्रालय की यह जिम्मेवारी बनती है कि सामाजिक न्याय से वंचित लोगों के संवैधानिक अधिकारों और अवसरों को यथासमय उपलब्ध करवाया जाए ।
उन्हें सरकारी नीतियों की जानकारी दें तथा सरकारी नीतियां में सुधार लाएं । समाज सेवी संस्थाओं का ये कर्तव्य बनता है कि कानूनी ढ़ांचे का निर्माण करें तथा समाज को जागरूक बनाने हेतु जागरूकता अभियान चलाएं । सामाजिक न्याय से वंचित समुदाय को सशक्त बनाएं , भेदभाव करने वालों का विरोध करें , शिक्षा के समान अवसर प्रदान करें , लैंगिक रूढ़िवादिता को समाप्त करें , सेमिनार और गोष्ठियां आयोजित करें तथा आमजन को नीति -नियमों और अधिकारों की जानकारी दें । इस प्रकार सामाजिक न्याय और समानता की दिशा में कारगर कदम उठाए जा सकते हैं ।
डॉ त्रिलोक चंद फतेहपुरी
अटेली, हरियाणा।
फोन नंबर -9992381001
Powered by Froala Editor

LEAVE A REPLY