- संगीता सागर
मनुष्य
ऐ मनुष्य,
तुम
हमेशा से ही
करते रहे दावा,
बेहतर होने का
और, हां
बेहतर तो तुम हो भी
बुद्धि जो है तुममें
इस बुद्धि का तुमने किया
कुशल प्रयोग
नहीं रहने दिया
चांद को चांद,
इतना ही नहीं
विस्तार दे दी
बुद्धि के उड़ान को
ग्रह नक्षत्रों से-
उफनते सागर के लहरों तक
तुम्हारी महत्त्वकांक्षी बुद्धि
ने तो नहीं बख्शा,
अपनी ही जाति को ,
और बना डाला
बुद्धि की प्रयोगशाला में
करोना जैसा
आदमखोर वायरस
और खड़ी कर दी
अपनी ही मानव जाति को
मौत के मुहाने पर ।
लेकिन सोचो,
गर् जो नहीं होंगे मनुष्य,
फिर करोगे राज किसपर,
उफनते सागर पर,
पिघलती ग्लेशियर पर
आग उगलती सूरज पर
या, फिर,
मृतप्राय धरती पर
सोचो मनुष्य, सोचो.......
संगीता सागर
मुजफ्फरपुर।
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