Swargvibha
Dr. Srimati Tara Singh
Administrator


neorptsSdot1hml7a166h1hc05thlt8g95c94mchc8l078lm59lhiu060834  · 


बया का कहानी विशेषांक आया है।
कह सकता हूँ इस बार की दीवाली बया की कहानियों के साथ गुज़री। कहानी पर कहानी पढ़ी। पढ़ रहा हूँ। कुछ कहानियों को दो-तीन बार भी पढ़ा। एक-एक कहानी पढ़ूँगा इरादा कर रखा है।
बया के कहानी विशेषांक को पढ़ते ध्यान गया कि बीस साल हो गये इस साहित्यिक पत्रिका को निकलते। बिना दावे और विवाद के। चर्चित हो जाने की महत्वाकांक्षा के बिना। प्रकाशित रचनाओं की गुणवत्ता और अंक निकलने की नियमितता में बिना किसी समझौते के।
कैसे भूला जा सकता है इन बीस सालों में कितना कुछ प्रकाशित हो सका। कितना कुछ हुआ। पत्रिका के संपादक कहानीकार गौरीनाथ जी ही बीमारी जीतकर नहीं निकले बल्कि पूरी दुनिया ही कोरोना महामारी को पार कर सकी। इतना कुछ हुआ। कितना कुछ बदल गया। पढ़ने की आदत, प्रकार से लेकर डाक विभाग का व्यवहार तक। कुछ भी वैसा न रहा। 
लेकिन बया वही रही। उसी आकार में लगभग समय पर निकली। प्रकाशित होते ही समय पर अवश्य घर पहुँची। सोचता हूँ अब हिंदी में ऐसी कितनी पत्रिका बची हैं जो हिंदी के सभी प्रमुख लेखकों को साथ-साथ प्रकाशित करती हैं। सदस्यता वादा निभाती हैं।
बया का जब पहला अंक निकला था तो मैं रीवा में रहता था। प्रवेशांक पर एक गोष्ठी भी हो पाई थी वहाँ। इस कहानी विशेषांक को देखें तो कहानीकार अब्दुल बिस्मिल्लाह से लेकर उपासना तक कौन नहीं हैं, अंक में। पिछले लगभग पच्चीस सालों की हिंदी कहानी उस पर संवाद आलेख सब मौजूद हैं।
यह मामूली बात नहीं कि कोई संपादक जो स्वयं श्रेष्ठ कथाकार है अपनी संपादन उत्कृष्टता औऱ निरंतरता से नहीं डिगा। वही ज़िद, प्रतिबद्धता, सरोकार संलग्नता औऱ प्रपंचो से दूर संपादक साहसिकता।
यही ख़याल आता है यह यात्रा यों ही चलती रहे। पुरानी धुन की जो पत्रिकाएँ बची हैं वो ऐसे ही छपती रहें। और हाँ बया की बात हो और अशोक भौमिक जी, श्रीधऱम, नंदिनी जी ओझल हो जायें यह कैसे हो सकता है।
एक पाठक की बधाई और आभार!
शशिभूषण














Musafir Baitha

बस, रणवीर सेना के सिंपेथाइजर कहानीकार बिपिन कुमार शर्मा का पत्रिका से जुड़ा होना दुखद है।
संयोग देखिए कि अभी ही मैंने अंक से बेचैन की कहानी पढ़ी है और टेकचंद की कहानी में हाथ लगाया है।
एक दो दिन पहले संपादकीय के अलावा संदीप मील की कहानी पढ़ी थी। अबतक पढ़ी दोनों कहानी साधारण है।
सायास चुन चुन कर पहले दलित और ओबीसी कहानीकारों की कहानियां पढ़ रहा हूँ। 
मेरा भी इरादा है कि इस अंक की एक एक सामग्री को पढ़ जाऊं। अगले अंक पर भी यही स्टैण्ड रहेगा।
दोनों अंकों पर विस्तार से अपनी सम्मति भी रखने का विचार है।



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Sunil Kumar Suman  · 

Gouri Nath जी के ज़ज़्बे को सलाम है। वे लगातार "बया" के संग्रहणीय निकाल रहे हैं.. ????✊????



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Adv Sandip Naik  · 

ठीक ठाक कहानियां है 
सतत रूप से पत्रिका का निकलना और साहित्य जगत में बने रहना भाई गौरीनाथ के बस का ही है वरना तो शहर में गालिब की आबरू क्या है







Author

Shashi Bhooshan

Adv Sandip Naik सही कहते हैं।






Shruti Kumud

पंद्रह कहानियाँ मैंने भी पढ़ ली हैं। बाकी पढ़ रही हूं। शानदार अंक है।



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Rajeev Shukla

Gouri Nath जी के साहसिक प्रयास को प्रणाम करता हूं। वे निरंतर स्तरीय हिन्दी पत्रिका "बया" के शानदार संस्करण प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच निकाल रहे हैं.. ! बधाई



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Pramod Shah

यह अंक कैसे मिल सकता है ?





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